खाली सिकायत पर गिरफ्तारी अउर हथकड़ी लगावे के प्रथा पर उठत सवाल
कपुरी, डेक्स।
समाज मा बढ़त जागरूकता के बीच खाली सिकायत के आधार पर कवनो व्यक्ति के गिरफ्तार कइके हथकड़ी लगावत हिरासत मा राखे के प्रथा पर गंभीर सवाल उठत हइन। कानूनी जानकार, मानव अधिकारकर्मी अउर सर्वसाधारण नागरिक ई व्यवस्था पर पुनर्विचार करे के मांग करत हइन।
विशेषज्ञन के कहब हउवे कि कवनो व्यक्ति तबले निर्दोष मानल जाय जबले अदालत से ओकर दोष साबित ना होय। खाली सिकायत पड़ते गिरफ्तारी कइल जाय त ओकर सामाजिक प्रतिष्ठा, पारिवारिक जीवन अउर पेशागत भविष्य पर नकारात्मक असर पड़ सकत हउवे।
कानून जानकारन के अनुसार आधुनिक न्याय प्रणाली मा गिरफ्तारी के अन्तिम विकल्प मानल गइल बा। यदि आरोपित व्यक्ति भागे के सम्भावना ना होय, सबूत नष्ट करे के खतरा ना होय अउर ऊ जाँच मा सहयोग करत होय, त हिरासत बिना भी अनुसन्धान आगे बढ़ावल जा सकत हउवे।
मानव अधिकारकर्मी बतावत हइन कि गिरफ्तारी के बाद मीडिया मा नाम अउर तस्वीर सार्वजनिक होय से व्यक्ति सामाजिक रूप से बदनाम हो जात हउवे। बाद मा अदालत से निर्दोष साबित होय के बावजूद ऊ बदनामी आसानी से समाप्त नइखे होत।
नेपाल के कानून मा कुछ मामिलन मा हाजिर जमानत जइसन व्यवस्था मौजूद होय, बाकिर व्यवहारिक रूप मा पुलिस द्वारा गिरफ्तारी के प्राथमिकता देवे के प्रवृत्ति देखे के मिलत हउवे। एह स्थिति के सुधार खातिर गैर-हिंसक अपराधन मा हिरासत-मुक्त अनुसन्धान, सम्मन प्रणाली के प्रभावकारी प्रयोग, गिरफ्तारी से पहिले पर्याप्त प्रमाण संकलन अउर झूठी सिकायत देवे वाला लोगन पर कानूनी कारबाही के व्यवस्था मजबूत करे के सुझाव दिहल जात हउवे।
कानूनी क्षेत्र से जुड़ल व्यक्तियन के मत बा कि न्यायिक प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी अउर मानव सम्मान के रक्षा करे वाली होखे के चाही। उहँकर कहब बा कि लोकतान्त्रिक समाज मा “पहिले प्रमाण, फेर गिरफ्तारी” के सिद्धांत के प्राथमिकता देहल जाय, ताकि निर्दोष नागरिकन के अधिकार सुरक्षित रह सकैं।
तपाईको प्रतिक्रिया !
सम्बन्धित खबर




















